Tuesday, October 03, 2017

दिल्ली, जामिया और बनारस की लड़कियों के नज़्र (वीर रस जैसा कुछ )

तोड़ दो पिंजरा, फोड़ दो भांडा!
यही न कह कर थे बहलाए?
रहना भीतर, यही भला है?
समझो अब असल अभिप्राय।

बात ये है, उनसे न होगा!
स्वयं ही सब कुछ लेना होगा
सुनो, सड़क बना लो डेरा
वख़्त न देखो, शाम-सवेरा।

समय की नंगी तलवारें हैं
सर पे लटकी, तुम्ही पकड़ लो!
समय अब नहीं कवच किसी का
तुम्ही समय के सर पे चढ़ लो!

छत सर पर अहसान नहीं है
बाप, गुरु, भगवान नहीं है।
सुनो, जो अबके हट गई पीछे
कर ली जो अब आँखें नीचे

घुट जाओगी, पिस जाओगी
अंधी गली में रह जाओगी।
नानी-दादी भी तो लड़ी थीं
पिंजरा तोड़ा, तब सँभली थीं

किसी की चिता पे न जल मरना
अपने पक्ष को साखर करना,
किया उन्होंने, अब बारी तुम्हारी
बात को समझो, जंग है जारी।

गुड़िया गूंगी सबको पसंद है
रोटी-चौका मुफ़्त कराएँ
दूध का क़र्ज़ मानते सब हैं
पूछते हैं, पर कैसे चुकाएँ?

मांग लो अब वो सारी चीज़ें
हर वो हक़ जो पाते हैं भाई
स्वर न दबाओ, ज़ोर से चीख़ो
यही न्याय है, यही भलाई।

कहेंगे वे, व्यर्थ है लड़ना
पत्थर की दीवार से भिड़ना,
भिड़ जाओ तुम, कह दो घर पे
खड़ी हो तुम स्वयं के दर पे ।

शुल्क की तुम चिंता मत करना
जान-मान का सौदा न करना
जहाँ सुरक्षा, घर तो वही है
घर का अर्थ कुछ और नहीं है।

कुर्सी भाषण फ़ोन कचहरी
नौकरी प्रेम धूप सुनहरी
चाँद रात असीम वाई-फ़ाई
अपना समझो जो हाथ आये।

भरो ख़ुशी दोनों हाथों में
खुशियां तुम्हारी क्यों कोई छीने?
ख़ुशीयों से न घबराओ तुम
यही विरासत, यही हैं गहने

गरजे बरसे गाली धमकी
शब्द मात्र हैं, कहो, और लाएँ!
असल बात है बस हक़ वाली
हक़ पे आँच न आने पाए।

ज़ेवर कोई बेच आएगा
कपड़ा-लत्था कहाँ तक ढोगी?
हक़ ही सब कुछ दिलवाएगा
रहेगा जब तक जीवित होगी।

नर बन जाते हैं नरेंद्र
मादा का कोई इंद्र नहीं है।
सब इन्द्रियाँ खोल कर देखो
शक्ति का बस केंद्र यही है।

सुषमा ममता वसुंधरा हो
अटल अधीर दिग्विजया भव।
शक्ती की ही परम्परा हो
चंडी प्रचंडा शमशीरा भव।

सुनो नाद गत-भावी कल का
नहीं हो तुम जो घट गयी घटना।
तोड़ दो पिंजरा, फोड़ दो भांडा!
अबके तुम पीछे मत हटना!

- annie zaidi
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