Friday, April 12, 2019

An addendum to Sarfaroshi?

चर्चा अपने क़त्ल का अब यार की महफ़िल में है
देखना है यह तमाशा कौन सी मंज़िल में है

देश पर क़ुरबान होते जाओ तुम, ए हिन्दीयों
ज़िंदगी का राज़ मुज़मिर खंजर-ए-क़ातिल में है

साहिल-ए-मक़्सूद  पर ले चल ख़ुदारा, नाख़ुदा
आज हिन्दुस्तान की कश्ती बड़ी मुश्किल में है

दूर हो अब हिंद से तारीक़ी-ए-बुग़्ज़-ओ-हसद
बस यही हसरत, यही अरमाँ हमारे दिल में है

बाम-ए-रिफ़त पर चढ़ा दो देश पर हो कर फ़ना
बिस्मिल अब इतनी हवस बाक़ी हमारे दिल में है

Words that may be difficult:

मुज़मिर: छुपा हुआ (hidden)
मक़्सूद: उद्देश्य (purpose)
नाख़ुदा: मल्लाह, कश्ती चलाने वाला (oarsman)
तारीक़ी: अंधेरा (darkness)
बुग़्ज़-ओ-हसद: नफ़रत और ईर्षा (spite or malice and jealousy)
बाम-ए-रिफ़त: ऊँची छत, ऊँचाई  (on a high terrace)

[कॉंग्रेस पुष्पांजलि 1930]

Another proscribed poem, from 'Zabt Shuda Nazmein (page 85)

Roman version available here: https://mehfilsukhan.wordpress.com/2015/01/25/ram-prasad-bismil/

These verses follow the pattern of the famous Sarfaroshi ki Tamanna, and are credited to Ram Prasad Bismil in the book. However, poems have been mistakenly credited to Ramprasad Bismil, including Sarfaroshi ki Tamanna which was actually written by Bismil Azeemabadi and perhaps made popular by Ramprasad. So I am not entirely certain which of these belongs to which 'Bismil'.

[Source cited for this poem: Congress Pushpanjali 1930]

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