Saturday, May 25, 2019

A banned lullaby (Ek zabt-shuda, aur thodi si daraaoni 'Lori')

Level of expectations dekh lo, भई! कभी-कभी देश भक्ति के आवेग में बह जाते हैं लोग, तो ऐसी नज़्में लिख डालते हैं जो अपना जोश तो दिखाती ही हैं, अगली पीढ़ी के मैदान-ए-जंग में क़ुर्बान होने का वायदा कर डालते हैं। ये वीर रस में लिखी अनोखी 'लोरी' है। सोचती हूँ, इन साहब के साहबज़ादे को रात में नींद आती भी थी?

नज़्म: लोरी
शायर: अख़्तर शीराज़ी

कभी तो रहम पर आमादा बेरहम आसमाँ होगा
कभी तो ये जफ़ा पेशा मुक़्क़दर मेहरबाँ होगा
कभी तो सर पे अब्र-ए-रहमत-ए-हक़ गुलफिशाँ होगा
    मस्सर्रत सा समाँ होगा
    मेरा नन्हा जवाँ होगा

किसी दिन तो भला होगा गरीबों की दुआओं का
असर ख़ाली न जायेगा ग़म-आलूद इल्तिजाओं का
नतीजा कुछ तो निकलेगा फ़क़ीराना सदाओं का
    ख़ुदा गर मेहरबाँ होगा
    मेरा नन्हा जवाँ होगा

ख़ुदा रखे जवाँ होगा तो ऐसा नौजवाँ होगा 
हसीन-ओ-कार्दां होगा दिलेर-ओ-तेगरां होगा
बहुत शीरीं ज़ुबाँ होगा बहुत शीरीं बयाँ होगा
     ये महबूब-ए-जहाँ होगा
     मेरा नन्हा जवाँ होगा

वतन और क़ौम की सौ जान से ख़िदमत करेगा ये
ख़ुदा की और ख़ुदा के हुक़्म की इज़्ज़त करेगा ये
हर अपने और पराए से सदा उल्फ़त करेगा ये
        हर एक पर मेहरबाँ होगा
        मेरा नन्हा जवाँ होगा

मेरा नन्हा बहादुर एक दिन हथियार उठाएगा
सिपाही बन के सू-ए-अर्सा-गाहे रज़्म जायेगा
दुश्मन की ख़ून की नहरें बहायेगा
       और आख़िर कामराँ होगा
        मेरा नन्हा जवाँ होगा

वतन की जंग-ए-आज़ादी में जिसने सर कटाया है
ये उस शीदा-ए-मिल्लत बाप का पुर-जोश बेटा है
अभी से आलम-ए-तिफ़ली का हर अंदाज़ कहता है
         वतन का पासबाँ होगा
         मेरा नन्हा जवाँ होगा

है उसके बाप के घोड़े को कब से इंतेज़ार उसका
है रस्ते देखती कब से फ़िज़ाएँ कारज़ार उसका
हमेशा हाफ़िज़-ओ-नाज़िर है परवरदिगार उसका
       बहादुर पहलवाँ होगा
       मेरा नन्हा जवाँ होगा

वतन के नाम पर इक रोज़ ये तलवार उठाएगा
वतन के दुश्मनों को कुंज-ए-तुर्बत में सुलाएगा
और अपने मुल्क को ग़ैरों के पंजे से छुड़ाएगा
      ग़ुरूर-ए-ख़ानदान होगा
      मेरा नन्हा जवाँ होगा

सफ़-ए-दुश्मन में तलवार इसकी जब शोले गिराएगी
शुजा'अत बाज़ुओं में बर्क़ बन कर लहलहायेगी
जबीं की हर शिकन में मर्ग-ए-दुश्मन थरथराएगी
       ये ऐसा तेगदान होगा
       मेरा नन्हा जवाँ होगा

सर-ए-मैदाँ जिस दम दुश्मन इसको घेरते होंगे
बजाये ख़ून रगों में इसकी शोले तैरते होंगे
सब इसके हमल-ए-शेराना से फेरते होंगे
      तह-ओ-बाला जहाँ होगा
      मेरा नन्हा जवाँ होगा


         *       *        *

[ज़ब्त शुदा नज़्में; पेज 232]
[source : आज़ादी की नज़्में]

दवाल: चमड़ी, belt
गुलफिशाँ: फूल बिखराता
मस्सर्रत: ख़ुशी
ग़म-आलूद: ग़म में सना हुआ
कार्दां: समझदार, होशियार
तेगरां: तलवार चलाने वाला (swordsman)
आलम-ए-तिफ़ली: बचपन (infancy)
पासबाँ: रखवाला, चौकीदार
कारज़ार: जंग का मैदान
सू-ए-अर्सा-गाह: मैदान की ओर
रज़्म: जंग
कामराँ: सफ़ल (successful)
मिल्लत: क़ौम या देश 
हाफ़िज़-ओ-नाज़िर: रखवाला, नज़र रखने वाला
सफ़-ए-दुश्मन: दुश्मन की क़तार (ranks of the enemy)
कुंज: कोना
तुर्बत: क़ब्र
शुजात: बहादुरी
हमल-ए-शेराना: शेर जैसा हमला
तह-ओ-बाला जहाँ: दुनिया को उल्टा करना

 *


Nazm : Lori
Poet: Akhtar Sheerani

Kabhi to reham par amaada be-reham aasmaan hoga
Kabhi to ye jafa pesha muqqadar meharbaan hoga
Kabhi to sar pe abr-e-rahmat-e-haq gulfishaan hoga
    Massarat sa samaan hoga
    Mera nanha javaan hoga

Kisi din to bhala hoga gareebon ki duaaon ka
Asar khaali na jaayega gham-aalood iltijaaon ka
Nateeja kuch to nilkega faqeerana sadaaon ka
     Khuda gar meharbaan hoga
     Mera nanha javaan hoga

Khuda rakhe, javaan hoga to aisa naujavaan hoga
Haseen-o-kaardaan hoga diler-o-taigraan hoga
Bahut shireen zubaan hoga bahut shireen bayaan hoga
     Ye mahboob-e-jahaan hoga
      Mera nanha javaan hoga

Vatan aur quam ki sau jaan se khidmat karega ye
Khuda ki aur khuda ke hukm ki izzat karega ye
Har apne aur paraaye se sada ulfat karega ye
         Har ek par meherbaan hoga
         Mera nanha javaan hoga

Mera nanha bahadur ek din hathiyaar uthayega
Sipahi ban ke su-e-arsa-gahe razm jayega
Dushman ki khoon ki nehre bahayega
         Aur aakhir kaamraan hoga
         Mera nanha javaan hoga

Vatan ki jang-e-aazaadi mein jisne sar kataaya hai
Ye us sheeda-e-millat baap ka pur-josh beta hai
Abhi se aalam-e-tilfi ka har andaaz kahta hai
         Vatan ka paasbaan hoga
         Mera nanha javaan hoga

Hai uske baap ke ghode ko kab se intezaar uska
Hai raste dekhti kab se fizaaein kaarzaar uska
Hamesha haafiz-o-naazir hai parvardigaar uska
        Bahadur pehelvaan hoga
        Mera nanha javaan hoga

Vatan ke naam par ik roz ye talvaar uthaayega
Vatan ke dushmano ko kunj-e-turbat mein sulaayega
Aur apne mulk ko gairon ke panje se chhudayega
       Guroor-e-khaandaan hoga
       Mera nanha javaan hoga

Saf-e-dushman mein talvaar iski jab shole giraayegi
Shujaat baazuon mein barq ban kar lahlahayegi
Jabeen ki har shikan mein marg-e-dushman thartharayegi
       Ye aisa taigdaan hoga
       Mera nanha javaan hoga

Sar maidaan jis dum dushman isko gherte honge
Bajaaye khoon ragon mein iski shole tairte honge
Sab iske hamle sheraana se pherte honge
      Tah-o-bala jahaan hoga
      Mera nanha javaan hoga

                  *
[Source - Aazaadi ki Nazmein]
[Zabt Shuda Nazmein, Page 232]

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