Sunday, April 07, 2019

Ali Jawad Zaidi sahab ki ek nazm: Kadi Dhoop

कड़ी धूप

अब के धूप कड़ी है, यारो!
ज़हन जहाँ तक जा सकता है, तप्ता रेगिस्तान है, यारो!
आशाओं की लू चलती है सन-सन जैसे आग
दहक रही हैं मन की चिताएँ और बदन का त्याग
जीवन की मुस्कान के पीछे भी है एक शमशान
और राही अंजान है यारो!

ख़ूनी काँटों की सौ नोकें तलवों में चुभ-चुभ कर टूटें
हर एक गाम पे छाले फूटे, उभरे और फिर फूट गये
कितने साथी छूट गये
रेगिस्तानों में कुम्हलाए कितने चेहरे, कितने शौक़!
गर्म हवाओं ने झुलसाए कैसे चेहरे, कैसे शौक़!
यारो अब के धूप कड़ी है!
लू के थपेड़े खाते खाते शायद हम कुछ थक से गये हैं!
क्या हम दम भर को सुस्ता लें या फिर यूँ ही चलते जायें?
काली आँधी से लड़ भिड़ कर सहराओं में बढ़ते जाएँ
दिल के फफोले फूटते जाएँ, रेगिस्तान दहेकता जाए?
अब के धूप कड़ी है, साथी

कैसे कैसे मीना टूटे, कैसे कैसे शाहिद छूटे
मुरझाए यादों के चमन में कैसे कँवल, क्या-क्या गुल बूटे!
शाखें उजड़ीं, पत्ते टूटे, फव्वारों के आँसू सूखे
बस्तियों के मतवाले नग़मे घुट-घुट कर दम तोड़ चुके हैं
जान छिड़कने वाले साथी कब के आँखें मोड़ चुके हैं
जीवन के इस रेगिस्तान में कैसी मय, कैसे पयमाने?
प्यास में भी मस्ती की सोचें हम जैसे कितने दीवाने!
साथी अब के धूप कड़ी है

_

मानवता के रेगिस्तान से शायद उभरे कोई हड़प्पा
कोई मोहनजोदारो उभरे!
टूटे घड़ो की नक़्क़ाशी के पीछे
कितने प्यासे लब हैं
जो सदियों ख़ामोश रहे हैं!
टूटी दीवारों के नीचे
क्या तहज़ीबें दबी पड़ी हैं
कितनी यादें दफ़न हुई हैं
कितनी कलाएँ, टूटे सपने, बिखरे गाने
उजड़ी माँगें, घुटती रूहें चीख़ रही हैं!
_

गंगा जमना की भूमी पर
जिसने राम, कृशन और बुध की ख़ाक-ए-क़दम से तिलक लगाया
अपने माथे पर सदियों तक
इस भूमी पर धूप और साये गले मिले हैं, लड़ते रहे हैं
कौरव पांडव एक बार क्या, सौ सौ बार लड़े हैं
पीपल और बरगद की छाया अब भी प्यार लिए है
धूप से पपड़ाए होंटो पर शबनम की नन्ही बूँदों ने
झुलसी झुलसाई आँखों को एक कैफ़-ए-मख़मूर दिया है
साक़ी की तीखी नज़रों ने ज़हन को एक नासूर दिया है!
_

अब के धूप कड़ी है, साथी!
आज अजंता के ग़ारों के सारे नक़्श चमक उठे हैं
गौतम की गोया खामोशी ताज़ा सरगम छेड़ रही है
संग तराशों ने पत्थर को सनम का सुंदर रूप दिया है
ज़हन-ए-मुसव्वर ने रंगों में जान भारी है, हुस्न भरा है
इन सनमों को दिल दे देना, श्रद्धा देना आदर देना
सदियों का दस्तूर रहा है
विंध्यांचल से परे दखन में द्रविड़ भाषाओं की भूमि
गंगा जमना की गोदी में मिलने वाली भाषाओं से
सुंदर शिव और सत्य सरापा
नर्मी गर्मी माँग रही है
यूँ ही नर्मी गर्मी सहते, कितने युग बीते ए साथी!
लेकिन - अब के धूप कड़ी है!
_

ख़ुसरो के नाज़ुक लफ़्ज़ों में फ़िक्र-ए-हिन्दी की गहराई
वेदांत और तसव्वफ की रंगा रंगी में, हम आहंगी
ताज महल की हुस्न आराई, "सिर्र-ए-अकबर" की दाराई
चिश्ती और नानक के नग़्मे, मीरा के गीतों की लए पर
वारिस और निज़ामुद्दीन के बोल सुरीले गूँज रहे हैं!
कितने धारों के मिलने से बेपायाँ सागर बनता है
कितने तूफाँ टकराते हैं साहिल के पथरीलेपन से
पत्थर कट जाते हैं लेकिन साहिल फिर भी रह जाता है
तूफाँ की ज़द में तहज़ीबें मिट-मिट कर बनती रहती हैं
मिनारा जलता रहता है
लेकिन - अब के धूप कड़ी है!
_

बाबुली यूनानी तहज़ीबें, हिन्दी ईरानी तहज़ीबें
तप-तप के निखरी तहज़ीबें
हमसे अब क्या माँग रही हैं?
धूप की तेज़ी हर चेहरे पर आब-ओ-ताब नयी लाई है
नया पसीना, नयी तवानाई की रग-रग से खिंच-खिंच कर
हर अबरू को कमान बनाता, हर मिस्रगान को तीर!
सीने के हर ज़ेर-वहम में एक नयी उम्मीद जगाता
आवाज़ों के कोलाहल में मुस्तक़बिल के गीत घोलता
नये सवेरे के क़दमों में आशा की पायल छनकता
नई दुल्हन की मंद चाल से ख़ुशी सरमस्ती बरसाता
तेरे जवान रौशन माथे पर मोती की माला है पसीना!
मेरे बा-हिम्मत सीने में मस्ती की ज्वाला है पसीना!
हम माथे से पसीना पोछें, जाम उठाएँ, साज़ उठाएँ
जब रुकते क़दमों को देखें, मस्ताना आवाज़ उठाएँ
अब के धूप कड़ी है यारो!
अब के फिर हम जाम उठाएँ।
_

अली जवाद ज़ैदी ( तेश-ए-आवाज़ , पेज 15)

1 comment:

Billy Mark said...

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